सावन की मायूसी !

मजबूर सी रात जब सूरज को पास बुलाती है,

ये पथराई आँखे रास्ते पर टिक जाती है !

इन्तेजार अपना गीत गुनगुनाता है, और

सब्र का साया भी साथ छोड जाता है !

सादा सा मन धू-धू कर जलता है तब,

आँसुओं का साथ भी छूट जाता है!

बेसुरूर से ख्वाब में देखते हैं तुझे दूर जाते हुए और,

बेकसूर सा मन ओड लेता है फिर से मायूसी का लिबाज़ !

तेरे आने की आस जब अकेला कर जाती है हमें,

एक कत्रा उम्मीद बन जाता है तब सावन में भीग जाने का रिवाज़ …

गर तू खुद आ नहीं सकता, तो साथ ले जा मेरे फुर्सत के पल,

और भेज दे पैग़ामे-सुकून की आयेगा तू जरूर – आज नहीं तो कल !

 

बेगानी सी जिन्दगी!

सुनहरी आस अब फीकी लगती है…

दमकता उल्लास अब लगता है बेगाना!

काली स्याह सी सच्चाई  अब खालिस लगती है

ऐसा ही है कुछ मेरे गम क पैमाना!

लोग हैं की तमाम चाहतों से लब्रेज रेहते हैं…

और हमारी चाहत है बेमतलब नाराज हमसे!

काश हमारी भी कोइ ख्वाइश हो जाती कभी पूरी

तो हम भी जिन्दगी को मान लेते ‘अपना’ मन से!

कमबख्त रात !

सुबह की रौशनी जब ढक देती है दिल की उदासी को

जिन्दगी फिर मजबूर करती है जीने के लिये!

दिन का उजाला भी समेट लेता है मन की हताशा को

और जिन्दगी फिर नचाती है हमें अपने इशारों पे,

कमबख्त रात के साये में जब निकलता है दर्द का गुबार

सैलाब आता है, उमढते हैं दुख के जज़बात…

रात के मायूस अंधेरे से जब खौफ खाता है होशोहवास,

पल भर में बिखर जाता है दिन भर में बटोरा उल्लास,

गम बयां करना जब चाहता है ये दिल, सुनने वाला कोई दूर तक नहीं मिलता,

और जब हौसले की डोर से खुद को बाँध लेते हैं हम, पूछते है तब वो हाल, खैर-ख्वाह बन कर…

मायूसी !

कोसों दूर फिर दमकती उम्मीद दिखी है,

कहीं फिर तो नहीं लाई मायूसी का पैग़ाम ?

आज फिर बटोरा है हौसला हालातों से लडने का,

कहीं फिर तो नहीं हार जायेगी ये शाम ?

जब जब ये जिन्दगी बिठाती है हमें हसीन सपनों की सेज पर,

लपक कर मुठ्ठी भर सपने हम भी पकड लेते हैं,

और म्रगत्रशना इस बार भी उलझा लेती है हमें,

यूं ही नहीं कहते हम जिन्दगी को मरुस्थल…

 

उदासी !

उदासी भी अब  हमें उदास नहीं कर पाती है,

आसूं भी अब आंखें नम नहीं कर जाते…

हंसी अब अजनबी सी लगती है और

खुशी भी करती है अनजान सी बातें!

फिर भी जीते हैं हम जिन्दगी की खातिर…

मुस्कुराते हैं गम को छुपाने के लिये!

अकेलापन अब डराता नहीं है हमें बल्की

सहलाता है हमें अपनी बाहों मे भर के

जब छोड देगी साथ, तब फुरसत में बहाएंगे  आंसू,

अभी तो आंख मे बसी उस आस ने रोका हुआ है रास्ता उनका!

 

 

 

नन्ही आशा !

आंखो में हजार सपने लिये नन्ही  सी आशा,

इन्तजार करती थी उस अनजान  आवाज का

हर बार जो बेच जाता था उसे सपनों की भाशा

खुश होती वो गली में आये गुब्बारे वाले को देख,

हर बार पूछती थी उससे एक ही सवाल,

क्या मुझे उडा ले जायेंगे ये रंग बिरंगे गुब्बारे,

उस ऊंचे आसमान के पार?

मुस्कुराता था वो गुब्बरेवाला, अपने फटे रुमाल से माथे का पसीना पोछता था,

बिक जाये कुछ गुब्बारे तो भर-पेट कट जायेगा महीना, मन ही मन वो सोचता था,

पर नन्ही ‘आशा’ का सवाल उसे भी सपने उधार दे जाता और उसका मन भी लालच मे आ जाता था,

की वो भी बांध ले खुद को एक गुब्बारे से, जो ले जाये उसे सैर पर ऊंचे आसमान के पार,

काश भर ले वो भी सपनों की उडान, नन्ही ‘आशा’ की गली मे खडा सोचता था वो हर बार !

तेरे साथ ना होने का गम !

जब तेरे साथ की परछाई मेरे साथ चलती थी…

जिन्दगी रेत की तरह फिसलती थी

बेहकती थी रात कि तरह…

पन्छीयों की तरह चहकती थी

जिन्दगी मेहकती थी खिलते गुलाब की तरह !

अब जो खुद को तेरे ज़िक्र के आइने मे देखता हूं,

उजडे घरोंदे की तरह बिखरी सी है जिन्दगी…

सुबकती है किसी टूटे हुए ख्वाब की तरह,

लुटी-लुटी सी है जुएं के दाव की तरह जिन्दगी !

 

 

परमपराएं!

जंजीरों में जकडी वो खुशियां,

आज भी कैद में हैं उन परमपराओं में!

और बाध लेती हैं हमको उन गाथाओं से,

जो कभी की दफ्न हुई दास्तान हैं…

 

तस्वीरों में जकडी वो कहानियां,

आज भी कैद में हैं उन परमपराओं में!

और डराती है हमको खौफ बन कर,

उन मेहलों के खन्डर बन चुके चबूतरों मे…

 

मन की काली कोठरी मे छुपी वो जिन्दगी,

आज भी कैद में हैं उन परमपराओं में!

जो न जाने कबसे तरस रही है,

आज के सूरज की रौशनी पाने के लिये…

 

और हम हैं की परमपराओं को जिन्दा रखने की बात करते हैं?

रूडीवादी घटनाओं को परमपरा का चोगा पेहनाकर,

समाज के साहूकार बनने का दम भरते हैं !

मर्जी !

मुझसे ना पूछो की मेरी मर्जी क्या है

मेरी मर्जी से पूछो आखिर उसकी मर्जी क्या है,

में मेरी मर्जी को तो टाल भी लूं गर जो मेरी मर्जी

अपनी मर्जी मुझपर ना थोपे!

 

मुझसे क्या पूछते हो मेरे अरमां क्या है,

मेरे अरमानों  से पूछो उनके अरमां क्या है,

में तो अपने अरमां दफन भी कर दूं जो गर मेरे अरमां

अपने अरमां मुझको ना सौंपे!

 

मुझसे क्या पूछते हो मेरी चाहत क्या है

जरा मेरी चाहत से पूछो उसकी चाहत क्या है,

की में तो अपनी चाहत छोड भी दूं गर

वो अपनी चाहत मुझमे ना रोंपे!

 

 

रात की गेहरी स्याही!

रात की गेहरी स्याही पूछती है सुबह के उजाले से

” ऐसा क्या है तुझमें, जो तू धो डालती है कल के रचे किस्से को?”

तब रौशन सी सुबह खोलती है राज, बोलती है-

“उन रात के किस्सों को धोती नहीं हूं में…

बस अपनी रौशनी से छुपा देती हूं,  ए रात, किस्से तो तू फिर जवां कर लेती है”

 

यादों की गेहरी परछाई पूछ्ती है आज की उजली पेहचान से

“” ऐसा क्या है तुझमें, जो तू मिटा डालती है उन बीते लम्हों को?”

तब तन्हा सा आज  खोलता है राज, बोलता है-

“मेरे बुलाने पर भी पास नहीं आते वो लम्हे, ए याद, वो तो आज भी तेरे ही पास बैठे है”

 

दिल की सूनी गेहराई पूछती है जहन की उजली  याददाश्त से

“” ऐसा क्या है तुझमें, जो तू दबा डालती है उन सोए अरमानों को?”

तब बेदर्द यददाश्त खोलती है राज, बोलती है-

“अरमानों को में चाहूं भी तो दफ्न नहीं कर पाती हूं, ए दिल, वो तो आज भी उमड रहे है तेरे सीने में”

 

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